भोले शंभु! आश्रय है बस एक तुम्हारा।
जल, स्थल और जड़-चेतन में,
सदा निवास है बस तुम्हारा।
मैं तो हूँ एक तुच्छ प्राणी,
क्या समझूं लीला यह न्यारा?
सदाशिव आश्रय एक तुम्हारा।
अलौकिक रूप है रूप तुम्हारा,
भाल पे शोभे चंद्र सितारा।
हाथ में त्रिशूल, डमरू, कमंडल,
योगी वेश तुम्हारा प्यारा।
सदाशिव आश्रय एक तुम्हारा।
जग के हित में खोली जटाएं,
गंगा को धरती पर लाए।
मृत्यु-दूत को कर दिया वापस,
मार्कंडेय को जीवन पाए।
सदाशिव आश्रय एक तुम्हारा।
देव-दानव मिलकर के मंथन,
सागर मथने का किया संकल्प।
रत्न निकले, सब हुए प्रसन्न,
हर कोई कहे, “यह भाग्य है अपना”।
सदाशिव आश्रय एक तुम्हारा।
जब निकला विष हलाहल भारी,
विष्णु बोले – “काम कठिन ये न्यारा”।
“अब शंभु का ही लो सहारा”,
तब सबने शरण तुम्हारी स्वीकारा।
सदाशिव आश्रय एक तुम्हारा।
अमृत की आशा नहीं की,
विष का प्याला सहज स्वीकारा।
सरल ह्रदय, करुणा से भरपूर,
भक्तों का तुम हरते हो सारा।
सदाशिव आश्रय एक तुम्हारा।
देव, दानव, मानव सबको,
तुम देते हो प्रेम सहारा।
तुम्हारा हूँ दास, हे प्रभु शंभु,
पाप मिटा दो, पार लगाओ भवसागर से हमारा।
सदाशिव आश्रय एक तुम्हारा।
सर्व जगत में वास तुम्हारा,
भक्तों को देते हो तुम सहारा।
दीन-दुखियों के पाप निवारे,
नाम तुम्हारा – जीवन हमारा।
सदाशिव आश्रय एक तुम्हारा।